अनवर चौहान
2014 से भाजपा के वजूद में आने के बाद इस मुल्क में अब मुस्लिम सियासत अपने आखरी सांस गिन रही है। भाजपा की सरकारें पहले भी रही हैं। मगर ऐसा कभी नहीं हुआ कि भारत की सरकार से मुसलमानों का नामों निशान मिटा दिया गया हो। आज देश के मुसलमानों ने चुप्पी साध ली है। और अपनी सियासी बर्बादी को होते हुए देख रहा है। इस सब के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो खुद मुसलमान है कोई और नहीं। आइये मैं आईना दिखाता हूं।
इस देश की सियासत को समझने की कोशिश की जाए। मुल्क में लगातार देश की विधान सभाओं और संसद में मुसलमानों की संख्या कम हो रही है। इस की खास वजह बताता हूं। देश में सिवाए दलितों के अलावा और कोई वोट मुसलमान उम्मीदवार को ट्रांसफर नहीं होता। यदि कांग्रेस से कोई उम्मीदवार चुनाव लड़ता है तो बाकी सारे हिंदू वोट भाजपा या किसी और दल को पड़ जाते हैं। मगर मुसलमान उम्मीदवार बाकी वोटों से महरूम रह जाता है और हार जाता है।
कुछ ऐसा ही हाल अखिलेश की समाजवादी पार्टी का है। यदि सपा के टिकट पर मुसलमान उम्मीदवार होता है तो यादव वोट भी उसे ट्रांसफर नहीं होता। वो सीधा भाज को पड़ जाता है। जबकि मुसलमान दशकों से पहले मुलायम सिंह के साथ और अब अखिलेश का पिछ लग्गू बना हुआ है। उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का 86 फीसदी वोट अखिलेश की पार्टी को पड़ा लेकिन इसके वावजूद सपा भाजपा को नहीं हरा पाई। यानि मुसलमानों के मनसूबे पर पानी फिर गया। मुसलमान का एक ही टारगेट होता है भाजपा को हराना। जो भाजपा को हराता हुआ दिखता है उसे मुफ्त में मुसलमानों का वोट बिना कोशिश के ही मिल जाता है। हैरत की बात देखिए मुस्लिम बहुल सीटों वाली सीट जैसे संभल और मुरादाबाद पर भी यादव उम्मीदवार जीतते रहे हैं। इसे मुसलमानों की बेवकूफी कहें क्या कुछ और। पहले मुलायम सिंह और बाद में अखिलेश ने खूब मुसलमानों का चूतिया काटा है।
अगर बसपा की बात न की तो ये लेख अधूरा माना जाएगा। कोई वक्त था जब बिना किसी लालच के मुसलमानों ने थोक में बसपा को वोट दिया। और उसने मुस्लिम वोटों के दम पर खूब फायदा उठाया। लेकिन बसपा भी भाजपा की गोद में बैठ गई। तब मुसलमान उससे भाग गया। वो स्वभाविक था। मगर एक बात गौर करने लायक ये है कि बसपा के टिकट पर दलित वोट मुसलमान उम्मीदवार को आसानी से ट्रांसफऱ हो जाया करता था। यही वजह करही कि बसपा के टिकट पर कई मुसलमान संसद तक पहुंचे। मगर ऐसा सपा के टिकट पर नहीं होता। 2027 में फिर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। मौजूदा हालात में फिर भाजपा के जीतने के इमकान हैं। यदि दलित और मुसलमान वोट एक जगह जमा हो जाते है तो भाजपा को चने चबवाए जा सकते हैं। चूंकि 21 फीसदी मुसलमान और 19 फीसदी दलित ये मिलकर 40 फीसदी हो जाते हैं।
अब बात करते हैं मुसलमानों की सियासत करने वाली असददुद्दीन की पार्टी की। बिहार विधानसभा चुनाव में उवैसी साहब ने गठबंधन के लिए लालू की राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का दरवाज़ा खूब पीटा। मगर किसी ने नहीं खोला। उवैसी की पार्टी को फिरका परस्त पार्टी क़रार दे दिया। मगर कांग्रेस से कोई पूछे की महाराष्ट्र में जो उसका शिव सेना के साथ गंठबंधन है तो वो क्या है। बात सिर्फ इतनी सी है कि इस मुल्क में ये कोई नहीं चाहता कि मुस्लिम लीडर शिप पनपे। लेकिन उवैसी ने ऐसे लोगों को खूब आईना दिखाया। उनकी पार्टी ने 28 सीटों पर गठबंधन को हरवाया और पांच सीटें जीतीं। जबकि अहंकारी कांग्रेस महज़ 6 सीटों पर सिमट गई। उवैसी ने इतना तो साफ कर दिया है कि आज नहीं तो कल उन्हें हिस्सेदारी तो देनी ही पड़ेगी।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में फिर उवैसी मैदान में होंगे। यकीनन वो सपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात करेंगे। मगर ये दोनों पार्टियां उवैसी से शायद दूरी ही बनाकर रखें। इस हालत में उवैसी को चंद्रशेखर रावण से गठबंधन की बात करनी चाहिए। चूंकि बसपा तो भाजपा की गोद में पहले से ही बैठी है। उवैसी ने यदि चंद्रशेखऱ के साथ मिलकर चुनाव लड़ा तो नतीजे चौंकाने वाले आ सकते हैं।