इंद्र वशिष्ठ, 
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2047 तक नशा मुक्त भारत बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सुरक्षा एजेंसियों ने ड्रग सिंडिकेटों को जड़ से समाप्त करने की दिशा में कार्य करना शुरू कर दिया है। 
गृह मंत्री लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले दिल्ली पुलिस और आईपीएस को ही भ्रष्टाचार मुक्त कर पूरे देश के सामने मिसाल पेश करनी चाहिए। क्योंकि बिना ईमानदार पुलिस अफसरों के नशा मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। वह पहले दिल्ली को ही नशा मुक्त करके देश भर की पुलिस के सामने उदाहरण पेश कर सकते हैं। दिल्ली पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। पुलिस कमिश्नर सतीश गोलछा में भ्रष्टाचार और आईपीएस अधिकारियों पर अंकुश लगाने का दम ही नहीं हैं। नशा मुक्त भारत के लक्ष्य को कुछ भ्रष्ट आईपीएस अधिकारी ही पलीता लगा रहे हैं। 
हैरानी की बात है कि गृहमंत्री की नाक के नीचे दिल्ली में ये सब हो रहा है। गृहमंत्री अगर चाहें तो उनके पास अब एक सुनहरा मौका है  वह आईपीएस-इंस्पेक्टर के नापाक गठजोड़/ सिंडिकेट की जड़ पर जबरदस्त प्रहार कर सकते हैं। वह पूरे देश में एक मिसाल पेश कर सकते हैं। अगर वह कोई कार्रवाई नहीं करते, तो उनमें और अन्य नेताओं में कोई फर्क नहीं रहेगा। जब तक ऐसा नापाक गठजोड़ रहेगा, अपराध और अपराधियों पर काबू नहीं पाया जा सकता। 
हाल ही में द्वारका जिले के पूर्व डीसीपी शंकर चौधरी और नारकोटिक्स सेल के इंस्पेक्टर सुभाष यादव के नशे के सौदागरों से वसूली करने के सनसनीखेज मामले सामने आए हैं। जिससे साफ़ पता चलता है कि पुलिस नशे के सौदागरों को पकड़ने के बजाए उनसे वसूली करने में लगी हुई है। 


द्वारका जिले के एंटी नारकोटिक्स सेल में तैनात हवलदार अजय को सीबीआई ने 21 अप्रैल 2026 को 2 लाख रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। सेल के दफ़्तर से 48 लाख रुपये से ज्यादा की रकम बरामद हुई। लेकिन उस समय सीबीआई ने नारकोटिक्स सेल के इंस्पेक्टर सुभाष यादव को गिरफ्तार नहीं किया। इससे सीबीआई की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया। पुलिस में चर्चा है कि आईपीएस गॉडफ़ादर ने उस समय इंस्पेक्टर सुभाष यादव को गिरफ्तारी से बचा लिया। मामले ने तूल पकड़ा तो सीबीआई ने 11 मई को इंस्पेक्टर सुभाष यादव को भी गिरफ्तार किया।
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ही अगर चाहें तो ही भ्रष्ट आईपीएस- इंस्पेक्टर के सिंडिकेट का पर्दाफाश हो सकता है।
सुभाष यादव की 100 करोड़ रुपये की संपत्ति/ लेनदेन का पता चला है। इस मामले में कई आईपीएस अधिकारियों के शामिल होने की खबरें आई हैं। 
इंस्पेक्टर सुभाष द्वारका जिले के तत्कालीन डीसीपी एम हर्षवर्धन (अब सीबीआई में) का भी खासमखास बताया जाता है। ये वही हर्षवर्धन हैं जिन्होंने जुलाई 2024 में राजेन्द्र नगर में कोचिंग सेंटर में बरसात का पानी भरने से हुई मौतों के मामले में एक बेकसूर कार चालक को गिरफ्तार किया था। कार चालक पर आरोप लगाया कि उसके कार चलाने से ही पानी कोचिंग सेंटर में घुस गया। पुलिस की इस करतूत पर कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई थी। ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌इस मामले से हर्षवर्धन की काबलियत की पोल खुल गई।
हालांकि सच्चाई ये है कि इंस्पेक्टर सुभाष का सिर्फ एक ही गॉडफादर नहीं हो सकता। आईपीएस शंकर चौधरी का तो पर्दाफाश हो ही चुका है। तत्कालीन डीसीपी संतोष मीणा के समय में सुभाष यादव को पहली बार नाइजीरियाई बहुल मोहन गार्डन इलाके में तैनात किया था। 
इस मामले के सामने आने के बाद स्पेशल पुलिस कमिश्नर (कानून-व्यवस्था जोन 2) मधुप तिवारी का अचानक तत्काल प्रभाव से 2 मई को अरुणाचल प्रदेश तबादला कर दिया गया। तबादला आदेश में उनके नए पद का जिक्र नहीं है। मतलब उन्हें कोई पद नहीं दिया गया। इससे ही इस चर्चा को बल मिला कि इंस्पेक्टर सुभाष कांड से कनेक्शन के कारण उन्हें हटाया गया है। अगर वाकई इस कारण से ही मधुप तिवारी को हटाया गया है। तो उनके खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। सिर्फ तबादला करके तो एक तरह से गृह मंत्रालय ने मधुप तिवारी को बचाने का ही काम किया है। द्वारका जिला स्पेशल कमिश्नर मधुप तिवारी के अन्तर्गत था। मधुप तिवारी पहले पश्चिम रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त भी रह चुके थे। मधुप तिवारी पहले भी चर्चा में आए थे जब सीबीआई ने डेपुटेशन का समय पूरा होने से पहले ही उन्हें वापस उनके काडर में भेज दिया था। 
इंस्पेक्टर सुभाष यादव बरसों से द्वारका जिले में तैनात है। इस दौरान द्वारका जिले में डीसीपी के पद पर अनेक आईपीएस अधिकारी रहें हैं। आईपीएस अधिकारियों की कृपा के बिना इंस्पेक्टर सुभाष यादव इतने लंबे समय तक एक ही जिले में रह ही नहीं सकता। अब ऐसे में या तो इन आईपीएस की इंस्पेक्टर सुभाष के साथ सांठगांठ थी या ये आईपीएस इतने नाकाबिल/ नादान/ मूर्ख थे कि उनका मातहत इंस्पेक्टर नशा तस्करों से जमकर वसूली करता रहा और उन्हें भनक तक नहीं लगी। दोनों ही सूरत में आईपीएस अधिकारियों की भूमिका और काबलियत पर सवालिया निशान तो लग ही जाता है। इसलिए इन अफसरों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई तो की ही जानी चाहिए। 
द्वारका जिले में डीसीपी के पद पर रहे आईपीएस संतोष मीणा, शंकर चौधरी, एम हर्षवर्धन और अंकित कुमार सिंह की छत्रछाया के दौरान ही इंस्पेक्टर सुभाष खूब फला फूला है।
द्वारका के पूर्व डीसीपी शंकर चौधरी के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने 5 फरवरी 2026 को एफआईआर दर्ज की है। शंकर चौधरी पर विदेशी नागरिक को गैर कानूनी तरीके से बंधक बनाकर 35 लाख रुपये वसूलने का सनसनीखेज आरोप है। लेकिन शंकर चौधरी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। जबकि गृहमंत्री को इस पुख्ता मामले में आईपीएस शंकर चौधरी को तुरंत गिरफ्तार कराना चाहिए था। ऐसे गुंडे किस्म के आईपीएस को जेल भेजने से ही बाकी भ्रष्ट आईपीएस अधिकारियों में भी कानून का डर पैदा होगा। दक्षिण रेंज के तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त संजय कुमार जैन की शिकायत पर विजिलेंस यूनिट ने शंकर चौधरी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। 
29 नवंबर 2023 को नाइजीरिया की एक महिला ने पीसीआर को फोन कर मिजोरम में तैनात आईपीएस शंकर चौधरी के इस अपराध की जानकारी दी थी। जिस पर दो साल बाद अब एफआईआर दर्ज की गई। इसके पहले द्वारका जिले के डीसीपी पद से शंकर चौधरी को 4 जून 2022 को हटाया गया था। डीसीपी पर एक महिला के सिर पर गिलास मारने का आरोप था। महिला के सिर में तीन टांके लगे थे। लेकिन पुलिस ने शंकर चौधरी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं की। 
अप्रैल 2026 में पंजाबी बाग निवासी एक्वालाइट कंपनी के मालिक देवेन्द्र से 2 करोड़ रुपये रंगदारी वसूलने के मामले में पश्चिम जिले के डीसीपी दराडे़ शरद भास्कर के बरसों से खासमखास पीए एसआई प्रदीप कुमार रांगी को हरियाणा पुलिस द्वारा तलाश करने का मामला सामने आया। इसके बाद डीसीपी दराड़े शरद भास्कर का 4 जून को पश्चिम जिले से डीसीपी मुख्यालय के पद पर तबादला कर दिया गया। 
पुलिस की नशे के सौदागरों से वसूली के और भी उदाहरण पेश हैं। सीबीआई ने 13 अप्रैह करटाल 2023 को दरिया गंज, नारकोटिक्स ब्रांच के दफ़्तर में एएसआई रुपेश और बिचौलिए अनुराग को दस लाख रुपए लेते हुए गिरफ्तार किया। पुलिस ने गिरफ्तार नशे की सौदागर महिला की मदद करने और उसके परिजनों को गिरफ्तार न करने की एवज में तीस लाख रिश्वत मांगी थी। एएसआई रुपेश एसीपी अनिल शर्मा की टीम में था यानी एसीपी की नाक के नीचे ही एएसआई रुपेश ने रिश्वत ली। इसके बावजूद एसीपी अनिल शर्मा के ख़िलाफ़ तत्कालीन पुलिस कमिश्नर संजय अरोरा ने कोई कार्रवाई नहीं की। आईपीएस  के गठजोड़ का जबरदस्त नमूना एसीपी अनिल शर्मा  है। 
पश्चिम जिले की तत्कालीन डीसीपी उर्विजा गोयल की रिपोर्ट के आधार पर 20 सितंबर 2021 को तत्कालीन पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने राजौरी गार्डन के तत्कालीन एसएचओ अनिल शर्मा को हटा दिया था। दरअसल सतर्कता विभाग ने जांच में पाया था कि तत्कालीन एसएचओ अनिल शर्मा इलाके में अवैध शराब की बिक्री और जुए जैसे अपराध को रोकने में पूरी तरह विफल है। पुलिस की अपराधियों से मिलीभगत है। 
इसके बावजूद इसी अनिल शर्मा को तत्कालीन कमिश्नर संजय अरोरा ने
नारकोटिक्स ब्रांच में तैनात कर दिया था। 
सीबीआई ने 31अगस्त 2022 को बाहरी उत्तरी जिले के ही बवाना थाना स्थित नारकोटिक्स शाखा में तैनात एसीपी बृज पाल के खिलाफ नशे के सौदागर से 15 लाख रुपए रिश्वत मांगने का मामला दर्ज किया था। 
इस मामले में एएसआई दुष्यंत गौतम को सात लाख 89 हजार रुपए रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया था।


(लेखक इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।