इंद्र वशिष्ठ,
दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलवा कर जनरल डायर को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस की झूठ की पोल खुल गई है।
अब यह सनसनीखेज खुलासा हो गया है कि उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।
उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया,
आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट सतीश कुमार सांगवान के साथ ड्यूटी पर थे, उन्होंने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आरएएफ को कार्रवाई करने का आदेश दिया। संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी (रोजनामचे) में आरएएफ के अधिकारी ने दर्ज कराया है कि आरएएफ ने इस कार्रवाई में 55 नॉन-इलेक्ट्रिक शेल, 15 इलेक्ट्रिक शेल, 5 टियर स्मोक ग्रेनेड, 1 एंटी-रायट गन तथा प्लास्टिक पैलेट के 2 राउंड का इस्तेमाल किया। 20 जुलाई की इस कार्रवाई के बारे में 22 जुलाई को रोजनामचे में दर्ज किया जाता आश्चर्यजनक है।
डीसीपी जवाब दें- डीसीपी राजा बांठिया और डीसीपी सचिन शर्मा बताएं कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन और बंदूक (आग्नेयास्त्रों) के इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी ?
कमिश्नर जिम्मेदार- आधिकारिक आदेश चाहे किसी आईपीएस अफसर ने दिया हो। जिम्मेदारी तो पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की बनती है।
पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के चहेते है इसलिए उन्हें पद से हटाया नहीं गया। अनुराग कुमार अगर गृह मंत्री के चहेते न होते तो, अगमू कैडर में उनसे सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई को आनन-फानन में कमिश्नर नहीं बनाया जाता। वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों पर जुल्म करने का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा।
कानून- दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 की धारा 70(1)( बी ) के तहत डीसीपी ने, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए, 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ रैपिड एक्शन फोर्स ( आरएएफ ) को आंसू गैस, लाठीचार्ज और बंदूक/आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। यह अनुमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 12-बोर पंप-एक्शन बंदूक के इस्तेमाल का निर्णय आरएएफ स्वयं नहीं कर सकती।
पैलेट गन- पैलेट गन एक ऐसा बंदूक/ हथियार है जो कारतूस से सैकड़ों छोटे-छोटे धातु के छर्रे बहुत तेज़ गति से छोड़ता है। इसे कई जगहों पर भीड़ नियंत्रण के लिए "कम घातक" हथियार माना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता और गंभीर चोट या मृत्यु का कारण भी बन सकता है। आमतौर पर 12-बोर की बंदूक (शॉटगन) में विशेष पैलेट कारतूस लगाए जाते हैं। ट्रिगर दबाने पर एक साथ अनेक छोटे छर्रे निकलते हैं। छर्रे फैलकर कई लोगों को एक साथ लग सकते हैं।
आरएएफ के एसओपी में 12-बोर पंप-एक्शन पैलेट गन केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में उपयोग करने का प्रावधान है। इसे डिफ्लेक्टर के साथ चलाया जाना चाहिए ताकि छर्रे मुख्यतः शरीर के निचले हिस्से पर लगें और गंभीर चोट का जोखिम कम हो।
(इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।